Friday, July 27, 2018

अस्त ग्रह

आकाश मंडल में जब भी कोई ग्रह सूर्य से एक निश्चित दूरी में या उसके अंदर आ जाता है तो सूर्य के तेज से वह ग्रह अपना तेज व शक्ति खोने लगता है जिसके कारण वह आकाश मंडल में दिखाई देना बंद हो जाता है, उस समय इसे अस्त ग्रह की संज्ञा दी जाती है। प्रत्येक ग्रह की सूर्य से यह समीपता का मापन अंशों में किया जाता है तथा इस मापन के अनुसार प्रत्येक ग्रह सूर्य से निम्नलिखित दूरी के अंदर आने पर अस्त हो जाता है :

१. चन्द्रमा सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
२. मंगल सूर्य के दोनों ओर 17 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
३. बुध सूर्य के दोनों ओर 14 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। किन्तु यदि बुध अपनी सामान्य गति की बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हों तो वह सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
४. गुरू सूर्य के दोनों ओर 11 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
५. शुक्र सूर्य के दोनों ओर 10 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। किन्तु यदि शुक्र अपनी सामान्य गति की बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हों तो वह सूर्य के दोनों ओर 8 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
६. शनि सूर्य के दोनों ओर 15 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
७. राहु-केतु छाया ग्रह होने के कारण कभी भी अस्त नहीं होते हैं।

अस्त ग्रह निर्बल हो जाता है और वह अपना फल सूर्य के माध्यम से प्रदान करता है। अस्त ग्रह को बल प्रदान करने का सबसे उत्तम एवं श्रेष्ठ उपाय उस ग्रह का मंत्र होता है। उस ग्रह के मंत्र का निरंतर जाप करने से अथवा उस ग्रह के मंत्र से पूजन करवाने से ग्रह को अतिरिक्त बल तो मिलता है, साथ ही साथ उसका स्वभाव भी अशुभ से शुभ की ओर बदलना शुरू हो जाता है और जातक को उसका शुभ फल प्राप्त होना प्राम्भ हो जाता है। कुंडली में किसी अस्त तथा अशुभ फलदायी ग्रह के लिए उसके बीज मंत्र अथवा वेद मंत्र के सवा लाख मंत्रों के जप से पूजा करवानी चाहिए तथा उसके पश्चात नियमित रूप से उसी मंत्र का जाप करना चाहिए जिस मंत्र जप के द्वारा ग्रह की पूजा करवायी गई थी।

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